ambaree

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नाम: Ambaree

Sometime later...

Saturday, December 26, 2009

एक बात

मैं शायद कुछ कहना चाहती हूँ
लेकिन असल बात शायद में ही छुप जाती है
बातें तो बहुत करती हूँ
लेकिन बात कहीं रह जाती है
मैं दिल खोल के रोई भी
आंसू से रात को चेहरा धो कर
सुबह माइग्रेन से आँख फूल जाती है
मैं कविताओं में सवाल पूछती हूँ
लेकिन कविता एक कविता बन के रह जाती है
दोस्तों से दिल की बातें कही है मैंने
जवाब नहीं मिलते, बस हमदर्दी मिल जाती है
ऐसा करते हैं आज कुछ नहीं कहते
जो नहीं कहा, वोही है, जो कुछ कह जाती है

Thursday, December 24, 2009

बेनामी के लिए

तुम क्या ढूँढते हो मेरी कविता में
क्या पढ़ना चाहते हो तुम

जाने प्रलय में क्या बुरा
और जाने क्यों अच्छी थी चाँद और तुम

तुम क्या ढूँढते हो मेरी कविता में
क्या कहना चाहते हो तुम

नुक़ताचीनी तो कर लेते हो
लेकिन खुल के कुछ नहीं बताते तुम

ये बेनामी होने का क्या मतलब है
क्या तुम्हारा तुम होना नाकाफी है?

खुद पे शर्मिंदा हो या मुझ से पर्दा
क्या छुपाना चाहते हो तुम

Tuesday, December 22, 2009

चाँद और तुम

जब चाँद की तरफ उंगली तुम्हारी उठी हो
तो चाँद की तरफ मैं देखूं क्या?
मैं तो लिपट गयी तेरी उंगली से ही
मांजे की तरह
चाँद थोड़े ही मुझे मिलेगा
तुम शायद मिल भी जाओ
जिस उंगली से चाँद दिखाते हो
उस उंगली से दिल का रास्ता भी दिखाओ
चाँद तक कहाँ मेरी डोर पहुंचेगी
जो काट के उसे ले आऊँ?
अपनी उंगली से एक इशारा दे दो
तो तुम को मैं चुरा ले आऊँ

Friday, December 18, 2009

प्रलय

पलाश में आग लगी पड़ी थी
लावा दरख़्त से टपकता रहा
मैं झोली फैलाए देखती रही
और आँचल मेरा जलता रहा

लग गयी है आग आसमान में
बादल धुंआ धुंआ हुए
आँखों में कोयले सुलगे
और राख के कुआं हुए

पानी के फव्वारों से
खून के धार फूटने लगे
धंसने लगी है ज़मीन
और तारे व्योम से टूटने लगे

एड़ी पर चक्कर काटती मैं कहीं
बलखा कर यूँ गिरी ऐसे
धुरी से छूट के ज़मीन
कृष्ण छिद्र में लुप्त हो गयी जैसे

Wednesday, December 16, 2009

सालगिरह

बहुत खंगाला अपने मन को
पर यादों का झाग नहीं निकला

सुबह सपने की देहलीज़ से उठ कर
अंगड़ाई लेती शुरू हुई
अखबार और चाय के कप में झाँका
फिर तेरा चेहरा निकला

गुलदस्ते आये हैं कई
सालगिरह की मुबारकबाद देने
पिछले साल साथ थे हम
इस बार तेरा एक ख़त निकला

शाम से कई बार घर की
घंटी बजती और मैं उठती
इस बार नहीं उठी मैं भी
क्या मालूम क्या सोचूं और क्या निकला

Tuesday, December 01, 2009

आखिरी विदा

शर्ट के खुले बटन से
झाँक रही थी शान तुम्हारी
मन ही मन में फेर लिया
मैंने तेरे सीने पर हाथ
तुम झेंप गए मुझे ताकता देख कर
मैं बरस पड़ी ज़ार ज़ार
दरवाज़े पर विदा ले के जब तुम चले
रौनकें चली और दीप बुझ गए इस पार

Friday, October 09, 2009

विरह

शाम ढल गयी सुनो कृष्णा
मन मेरा मसोस के बैठी मैं
तुम आये न, न आये तुम
सूनी रात ओढ़ के सोयी मैं