सिड को जवाब
कुछ आग मिली, तो क्या ग़म है
एक उंगली उठा देना बिन सोचे ही
मुजरिम दिल का अफ़सोस क्या कम है
गुनाह तो बड़े हंसीं होते हैं
मुखोटे तब ही तो उतरते हैं
बेनकाब चेहरों को देख कर
क्यों तुम जैसे लोग बिगड़ते हैं
सच देख कर पाखण्ड करार देना
ये तो पुरानी आदत है
नंगे अरमानों को ढक दो बस
यही ज़माने की फितरत है
धुंआ उड़ता मुझ से बोला
हंगामा बरपा है शहर में
क्यों तू इतनी खामोश है
रिश्ते टूटने के कहर में
तुम ने उंगली उठायी है
मैं तुम से ये कहती हूँ
उड़ जाने दो फरेब के साए को
इस छल के पीछे मैं जीती हूँ
