ambaree

Name: Ambaree

Sometime later...

Saturday, March 28, 2009

सिड को जवाब

बंद कमरों में ठंडे पड़ते रिश्ते को
कुछ आग मिली, तो क्या ग़म है
एक उंगली उठा देना बिन सोचे ही
मुजरिम दिल का अफ़सोस क्या कम है

गुनाह तो बड़े हंसीं होते हैं
मुखोटे तब ही तो उतरते हैं
बेनकाब चेहरों को देख कर
क्यों तुम जैसे लोग बिगड़ते हैं

सच देख कर पाखण्ड करार देना
ये तो पुरानी आदत है
नंगे अरमानों को ढक दो बस
यही ज़माने की फितरत है

धुंआ उड़ता मुझ से बोला
हंगामा बरपा है शहर में
क्यों तू इतनी खामोश है
रिश्ते टूटने के कहर में

तुम ने उंगली उठायी है
मैं तुम से ये कहती हूँ
उड़ जाने दो फरेब के साए को
इस छल के पीछे मैं जीती हूँ

Sunday, November 09, 2008

क्या तुम समझोगी मां

तुम ने विदाई पर समझाया था

अब वही तेरा घर और वही तेरा संसार है

आज लोक लाज को छोड़ मैं चली जाऊं

तो, क्या तुम समझोगी मां

ससुराल में कोई गैर नहीं

किसी से कोई बैर नहीं

फिर भी अगर मैं उन्हें न अपनाऊँ

तो, क्या तुम समझोगी मां

प्यार सब मुझ से करते हैं

सब लाड भी खूब लड़ते हैं

फिर भी दिल खाली खाली है

बोलो, क्या तुम समझोगी मां

किसी से कोई शिकायत नहीं

किसी से कोई आपत्ति भी नहीं

लेकिन दिल नहीं लगता साथ उनके

अब भी क्या तुम समझोगी मां

चलने फिरने पर रोक नहीं

किसी काम पर कोई टोक नहीं

खयालात सबके हैं खुले खुले

चेहरे सबके हैं प्यार भरे

फिर ऐसा जाने क्यों लगता है

खुले दरवाज़े के पिंजरे में हूँ

संस्कारों में बंधी पड़ी हूँ

मैं तोड़ दूँ बंधन क्या

मैं छोड़ दूँ चौखट क्या

सब तिरस्कार तेरा करेंगे

ताने कई कसेंगे

फिर भी क्या तुम समझोगी मां

Saturday, October 11, 2008

परछाई

उस दिन दिख गई लर्जिश तेरे होंठो पर
वरना मैं भी समझता था सब गुज़र चुका
देखा मैंने वक्त बीता लेकिन लम्हे नहीं
उम्र गुज़री लेकिन बढ़ी नहीं
वहीं अटके पड़े थे दोनों अब भी
जहाँ जुड़ गई थी किस्मतें अपनी
उँगलियों में उंगलियाँ फंसाए
होंठो पर होंठ टिकाये
जिस्म राख हो गए थे वहीं
परछाईयाँ आगे बढ़ गयीं

कृष्ण प्रेम

वृन्दावन में आँख मिचौली

खेले राधा

तक - ता - थई, अक - ता - थई,

एक गोपी आंखों पर

उसके चुनरी बाँध गई

अक - ता- थई

कूहे - कूहे कानों में सखियाँ

राधे अब यहाँ गई, फिर वहां गई

वंशी बाजे मद्धम मद्धम

सुध यहाँ से अब तहां गई

राधे - राधे बोले कृष्णा

राधे जहाँ जहाँ गई

गोपी छोड़ पीछे, चुनरी फ़ेंक

भटके राधा, तक - ता- थई

Monday, September 08, 2008

गलती से...

गलतियां हो जाती हैं
कभी जान के, कभी अनजाने में
निशान रह जाते हैं मगर
गलती से

पुरानी पड़ जाती हैं शिकायतें
सुनवाई नहीं, मलाल भी ख़त्म
माथे पर शिकन आ जाती हैं मगर
गलती से

निकाल फेंका हर ख़त
जला डाली हर निशानी
सपनों में दिख जाते हो मगर
गलती से

आहिस्ता से अलैदा हुए थे
हम से तुम, तुम से हम
शहर, गली, चौबारा मिलवा देते हैं मगर
गलती से

गलतियों से मुहोब्बत हो जाए तो
गलतियां हो जाती हैं
दो बार, चार बार, बार बार
गलती से




Friday, June 20, 2008

विद लव - पापा

कितनी बक बक करती थी
कान पक जाया करते थे
हंसती थी ठट्ठे मार के
शर्म से गाल मेरे फट जाया करते थे

अल्हड़पन गंवारों जैसा था
पर समझ कवियों के जैसे थी
बिन बुलाए कमरे में दाखिल होना
फिर झेंप बच्चों के जैसी थी

क्या दिन, क्या रात हो
सपनों में ही जीती थी वो
शायराना डायरी लिखती थी
घरौंदों से घिरी मिलती थी वो

सोने चांदी के कप प्लेट में
चाँद ही उसका केक था
तारे माथे की ओस थे
सूरज आंखों का सेक था

अब तस्वीरों में कैद है
दीवार पे चिपकी रहती है
कल तक मेरा सर खाती थी
अब बस यादों में रहती है

Thursday, June 19, 2008

स्वाति का स्केच

उँगलियों पर पल गिनती
जिंदगी एक कश की तरह
कुछ फूंकती, कुछ उड़ाती
एड़ी पर चक्कर मारती
एवें कुछ फलसफे झाड़ती
गुज़र जाती है कहकहे लगाती
बवराई आंखों में कभी एक ख्वाब लिए
नम पलकों पर कभी एक लदी आस लिए

Wednesday, June 18, 2008

फ्लिर्टिंग

दो पंखुडियों पर

शरारत ठनी

जामुनी आँखें कतरायीं

पेशानी पर हरकत बनी

जुल्फों के पेंच

हाथों से खेंच

सिहरन उतरी

साँसें कसीं

कानों में मेरे

एक दिलफेंक हँसी